भारत का डबल एआई विज़न: आकांक्षी भारत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की संयुक्त शक्ति
भारत तेजी से उस दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहाँ technology केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन रही है। इसी दृष्टिकोण के साथ देश ने IndiaAI Mission की शुरुआत की है। इस मिशन का उद्देश्य है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, स्टार्टअप्स और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में व्यापक रूप से लागू करना, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके।
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| India AI Impact Summit 2026 |
डबल एआई की अवधारणा: टेक्नोलॉजी और आकांक्षाओं का संगम
दुनिया आज एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शक्ति को पहचान रही है। लेकिन भारत के पास एक अतिरिक्त शक्ति है—आकांक्षी भारत। जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आकांक्षी भारत की ऊर्जा एक साथ आती है, तो विकास की गति स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है। यह तकनीक केवल नवाचार का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के लिए अवसरों का नया द्वार है।
भारत का लक्ष्य केवल घरेलू स्तर पर एआई को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी नेतृत्व स्थापित करना है। इसी कड़ी में क्वाड देशों—India, United States, Japan और Australia—के साथ तकनीकी सहयोग को भी मजबूती दी जा रही है।
कनेक्टिविटी: आकांक्षी भारत की मजबूत नींव
आकांक्षी भारत का एक सशक्त उदाहरण देश में कनेक्टिविटी का विस्तार है। विशाल भौगोलिक विविधता वाले भारत में तीव्र और समावेशी कनेक्टिविटी आवश्यक थी। इसी सोच के तहत नागरिक उड्डयन क्षेत्र में व्यापक सुधार किए गए और UDAN Scheme की शुरुआत की गई।
उड़ान योजना के माध्यम से:
टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए हवाई अड्डों का विकास हुआ।
हवाई यात्रा को किफायती बनाया गया।
लगभग 3 लाख उड़ानें संचालित हुईं।
डेढ़ करोड़ से अधिक यात्रियों ने इसका लाभ उठाया।
2014 में जहाँ देश में लगभग 70 हवाई अड्डे थे, वहीं अब इनकी संख्या 150 से अधिक हो चुकी है।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि जब समाज की आकांक्षाएँ नीति-निर्माण का आधार बनती हैं, तो विकास को नई गति मिलती है।
शिक्षा, शोध और नवाचार में नई ऊँचाइयाँ
पिछले एक दशक में शिक्षा, कौशल विकास, अनुसंधान और रोजगार पर विशेष बल दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की उपस्थिति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पेटेंट और ट्रेडमार्क के क्षेत्र में देश ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। आज भारत वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, जहाँ हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने शोध केंद्र स्थापित किए हैं।
स्टार्टअप इकोसिस्टम और भविष्य की दिशा
भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी अभूतपूर्व विस्तार देख रहा है। नवाचार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और युवा प्रतिभा का संगम देश को तकनीकी महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर कर रहा है। एआई आधारित समाधान स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बना रहे हैं, शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बना रहे हैं तथा छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं।
समावेशी विकास की प्रतिबद्धता
नीतियाँ बनाते समय मध्यम वर्ग, सामान्य नागरिक, छोटे उद्यमी, एमएसएमई, युवा और महिलाओं की आकांक्षाओं को केंद्र में रखा जा रहा है। उद्देश्य स्पष्ट है—ईज ऑफ लिविंग और क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार।
भारत का यह डबल एआई विज़न—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आकांक्षी भारत—सिर्फ तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की व्यापक रूपरेखा है। यही संयुक्त शक्ति भारत को 21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रही है।
एआई की दुनिया: सुपर पावर बनाम मिडिल पावर
दुनिया अब एआई के मामले में दो हिस्सों में बंटती दिख रही है। एक तरफ वे देश हैं जो एआई सुपरपावर बन चुके हैं—जिनके पास अपार पूंजी, अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों की टीम है। दूसरी तरफ वे देश हैं जिन्हें “मिडिल पावर” कहा जा सकता है—जैसे भारत, कनाडा और यूरोप के कई देश—जो क्षमता तो रखते हैं, लेकिन संसाधनों की दौड़ में पीछे हैं।
एडवांस्ड एआई मॉडल तैयार करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश, शक्तिशाली डेटा सेंटर और उच्च स्तरीय रिसर्च इकोसिस्टम की जरूरत होती है। हर देश के लिए यह संभव नहीं। अगर मिडिल पावर देश इस रेस में पीछे रह गए, तो उनकी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो जाएगी। उनका डेटा, उनका बाजार और उनकी डिजिटल संप्रभुता दूसरों के हाथों में चली जाएगी।
डिजिटल आज़ादी बनाम डिजिटल गुलामी
आज के दौर में देशों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है—डिजिटल रूप से स्वतंत्र और डिजिटल रूप से निर्भर। जिन देशों के पास अपना एआई सिस्टम, अपने सर्वर, अपना डेटा और अपनी तकनीक है, वे डिजिटल रूप से स्वतंत्र हैं। लेकिन जिनकी डिजिटल बुनियाद विदेशी कंपनियों पर टिकी है, वे धीरे-धीरे “डिजिटल गुलामी” की ओर बढ़ सकते हैं।
17वीं से 19वीं सदी के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपने नियंत्रण में ले लिया था। 21वीं सदी में वही काम डेटा, एल्गोरिद्म और एआई के माध्यम से किया जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हथियार तलवार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी होगी।
भारत की स्थिति और संभावनाएं
भारत आज अपना वैश्विक एआई प्लेटफॉर्म विकसित करने की दिशा में प्रयासरत है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी, मजबूत आईटी टैलेंट और विशाल डिजिटल बाजार है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
हाल ही में भारत ने “सर्वम” नाम का स्वदेशी एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जिसे एआई समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देखा। बताया जा रहा है कि यह 22 भारतीय भाषाओं में काम कर सकता है और कई मामलों में ChatGPT और Google Gemini को चुनौती देने की क्षमता रखता है। यह पहल दिखाती है कि भारत में क्षमता की कमी नहीं है—जरूरत है निरंतर निवेश और दीर्घकालिक रणनीति की।
इतिहास से सीख
इतिहास गवाह है कि जो देश बड़ी क्रांतियों में पीछे रह जाता है, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
1820 के आसपास शुरू हुई औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व इंग्लैंड ने किया।
1957 में अंतरिक्ष क्रांति की शुरुआत सोवियत संघ और अमेरिका ने की।
1969 में अमेरिका चांद पर पहुंच गया।
1970 के दशक में कंप्यूटर क्रांति का लाभ पश्चिमी देशों ने उठाया।
1990 के दशक की इंटरनेट क्रांति में भी भारत देर से शामिल हुआ।
2004 के बाद सोशल मीडिया क्रांति आई, लेकिन भारतीय उपयोगकर्ता विदेशी प्लेटफॉर्म्स के उपभोक्ता बनकर रह गए।
भारत ने जरूर तीन बड़ी ऐतिहासिक क्रांतियों का अनुभव किया—1947 की स्वतंत्रता, 1960 के दशक की हरित क्रांति और 1970 की श्वेत क्रांति—लेकिन टेक्नोलॉजी आधारित वैश्विक क्रांतियों में हम अक्सर देर से पहुंचे।
संकट के समय आत्मनिर्भरता का महत्व
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारत को दुश्मन की सटीक जीपीएस लोकेशन की आवश्यकता थी, लेकिन उस समय अमेरिका ने डेटा साझा करने से इनकार कर दिया। यह घटना बताती है कि संकट के समय उधार की तकनीक भरोसेमंद नहीं होती। एआई के युग में भी यही सिद्धांत लागू होता है।
आगे की राह
एआई केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि आने वाले समय की सबसे बड़ी शक्ति है। यह इंसानों के हाथों का ही नहीं, दिमाग का काम भी कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है—भविष्य में इंसान की भूमिका क्या होगी?
भारत के लिए अभी देर नहीं हुई है। अगर एआई को राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया जाए, रिसर्च और डेवलपमेंट पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जाए और स्वदेशी टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि वैश्विक नेतृत्व भी हासिल कर सकता है।
आज विकल्प साफ है—या तो हम एआई की मेज़ पर बैठकर नियम बनाएँ, या फिर दूसरों द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार चलें। आने वाले दशक तय करेंगे कि भारत डिजिटल आज़ादी की राह पर चलता है या डिजिटल निर्भरता की ओर।
Sundar Pichai (Google CEO)
पर सही नियत से सही निर्णय लेते हैं। फ्रेंड्स, कोविड ग्लोबल पेंडेमिक के समय दुनिया ने देखा है कि जब हम एक दूसरे के साथ खड़े होते हैं तो असंभव भी संभव हो जाता है। वैक्सीन विकास से लेकर सप्लाई चेन तक डाटा साझा करने से लेकर जीवन बचाने तक सहयोग ने ही समाधान दिया। टेक्नोलॉजी कैसे मानवता की सेवा का माध्यम बन सकता है यह हमने भारत में कोविड काल में देखा है। हमारा जो डिजिटल वैक्सीनेशन प्लेटफार्म था उसने करोड़ों लोगों को समय पर वैक्सीननेट कराने में बहुत मदद की। हमारे यूपीआई ने उन मुश्किल परिस्थितियों में भी यह सुनिश्चित किया कि लोग आसानी से
ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करते रहे। यूपीआई ने भारत में डिजिटल डिवाइड को दूर करने में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। बीते वर्षों में भारत ने एक वाइब्रेंट डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है। हम इसे दुनिया के साथ भी शेयर कर रहे हैं। क्योंकि हमारे लिए टेक्नोलॉजी पावर का नहीं बल्कि सेवा का माध्यम है। पावर नहीं एंपावर करना। एआई की दिशा भी ऐसी होनी चाहिए जिससे पूरी मानवता का कल्याण हो। फ्रेंड्स अतीत में टेक्नोलॉजी ने डिवीजन क्रिएट किए। लेकिन वर्तमान में एआई टेक्नोलॉजी सबके लिए सुलभ हो। सबकी पहुंच में हो। यह
हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए आज जब हम एआई के फ्यूचर पर चर्चा कर रहे हैं तो हमें ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं को भी एआई गवर्नेंस के केंद्र में रखना होगा। एक्सीलेंसीज युग चाहे कोई भी रहा हो एथिक्स हमेशा ही चर्चा के केंद्र में रहा है। अंतर बस इतना आया है। कि पहले अनएथिकल बिहेवियर का दायरा बहुत छोटा होता था। लेकिन एआई में इसका दायरा असीमित है। अनलिमिटेड है। इसलिए एआई के लिए हमें एथिकल बिहेवियर और नॉर्म्स का दायरा भी असीमित बनाना होगा। एआई कंपनियों के सामने बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। प्रॉफिट के साथ-साथ पपज पर भी फोकस हो।
ऐसे एथिकल कमिटमेंट की बहुत आवश्यकता है। व्यक्तिगत स्तर पर एआई हमारी लर्निंग, इंटेलिजेंस और इमोशंस को प्रभावित कर रही है। एक्सीलेंसी एआई के एथिकल उपयोग के लिए मेरे तीन सुझाव हैं। फर्स्ट डाटा सोवनिटी को रिस्पेक्ट करते हुए एआई ट्रेनिंग के लिए एक डाटा फ्रेमवर्क बने। जैसे एआई में कहा जाता है गार्बेज इन गार्बेज आउट। अगर डाटा सुरक्षित संतुलित विश्वसनीय नहीं होगा तो आउटपुट भी भरोसेमंद नहीं होगा। इसलिए ग्लोबल ट्रस्टेड डाटा फ्रेमवर्क जरूरी है। सेकंड एआई प्लेटफार्म अपने सेफ्टी रूल्स बहुत क्लियर और ट्रांसपेरेंट
रखें। हमें ब्लैक बॉक्स के बदले ग्लास बॉक्स अप्रोच चाहिए। जहां सेफ्टी रूल्स देखें। और वेरीफाई किए जा सके तब अकाउंटेबिलिटी भी क्लियर होगी और बिजनेस में एथिकल बिहेवियर को भी बूस्ट मिलेगा। थर्ड एआई रिसर्च में पेपर क्लिप प्रॉब्लम का उदाहरण दिया जाता है। अगर किसी मशीन को सिर्फ पेपर क्लिप बनाने का लक्ष्य दे दिया जाए तो वह उसका एक काम के लिए दुनिया के सारे रिसोर्सेज को दांव पर लगाकर भी वही काम करती रहेगी। इसलिए एआई को क्लियर ह्यूमन वैल्यूस और गाइडेंस की जरूरत है। टेक्नोलॉजी पावरफुल है लेकिन डायरेक्शन हमेशा मानव ही तय करेगा।
फ्रेंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एआई की ग्लोबल जर्नी में एस्पिरेशनल इंडिया एआई की बड़ी भूमिका है। और अपने इस दायित्व को समझते हुए भारत आज बड़े कदम उठा रहा है। अपने एआई मिशन के माध्यम से आज भारत में 38,000 जीपीएल मौजूद हैं। और अगले 6 महीनों में हम 24000 जीपीयूस और लगाने जा रहे हैं। हम अपने स्टार्टअप्स को बहुत ही अफोर्डेबल रेट्स पर वर्ल्ड क्लास कंप्यूटिंग पावर उपलब्ध करा रहे हैं। हमने एक एआई कोस्ट भी बनाया है। इसके माध्यम से 7500 से अधिक डाटा सेट्स और 270 एआई मॉडल्स को नेशनल रिसोर्स के रूप में शेयर किया गया है। फ्रेंड्स एआई को लेकर
भारत की दिशा स्पष्ट है। भारत का विचार स्पष्ट है। एआई पूरी मानवता की भलाई के लिए एक शेड रिसोर्स है। हमें मिलकर ऐसा एआई फ्यूचर बनाना होगा जो इनोवेशन को आगे बढ़ाएं। इंक्लूजन को मजबूत करें और ह्यूमन वैल्यूज का समावेश करके आगे बढ़े। जब टेक्नोलॉजी और ह्यूमन ट्रस्ट साथ-साथ चलेंगे तो एआई का सही इंपैक्ट दुनिया पर दिखेगा। तो यहां पर प्रधानमंत्री का लीडर्स प्लनरी में संबोधन और एथिकल एआई के लिए तीन सुझाव उन्होंने बताए यहां पे कि कैसे डाटा सोवनिटी ग्लोबल ट्रस्टेड डाटा फ्रेमवर्क को लेकर काम करना जरूरी है। साथ ही एआई की
जो सेफ्टी रूल्स हैं वो पारदर्शी हो यानी कि ब्लैक बॉक्स की जगह ग्लास बॉक्स अप्रोच हो और एआई क्लियर ह्यूमन वैल्यूस और गाइडेंस की जरूरत है। ऐसे में एआई एक बहुत ही ताकतवर टेक्नोलॉजी है। इसलिए हमेशा जो गाइडेंस रहे वह मानवता ही करेंगे और साथ ही आई को लेकर जो भारत का विचार

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