Modi Unveils MANAV Vision at India AI impact Summit 2026

 भारत का डबल एआई विज़न: आकांक्षी भारत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की संयुक्त शक्ति

HindustanTajaNews विशेष रिपोर्ट
21वीं सदी का इतिहास जब लिखा जाएगा, तो उसमें एक अध्याय निश्चित रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के नाम होगा। लेकिन उस इतिहास में भारत की भूमिका क्या होगी? क्या भारत केवल उपभोक्ता बनकर रहेगा या फिर भविष्य के नियम तय करने वालों में शामिल होगा?
HindustanTajaNews की इस विशेष रिपोर्ट में हम समझेंगे—भारत का “डबल एआई विज़न” क्या है? कैसे आकांक्षी भारत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मिलकर एक नई विकास गाथा लिख सकते हैं? और क्यों यह सिर्फ तकनीक की कहानी नहीं, बल्कि डिजिटल आज़ादी और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है।

भारत तेजी से उस दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहाँ technology केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन रही है। इसी दृष्टिकोण के साथ देश ने IndiaAI Mission की शुरुआत की है। इस मिशन का उद्देश्य है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, स्टार्टअप्स और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में व्यापक रूप से लागू करना, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके।

India AI Impact Summit 2026
India AI Impact Summit 2026


डबल एआई की अवधारणा: टेक्नोलॉजी और आकांक्षाओं का संगम

दुनिया आज एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शक्ति को पहचान रही है। लेकिन भारत के पास एक अतिरिक्त शक्ति है—आकांक्षी भारत। जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आकांक्षी भारत की ऊर्जा एक साथ आती है, तो विकास की गति स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है। यह तकनीक केवल नवाचार का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के लिए अवसरों का नया द्वार है।

भारत का लक्ष्य केवल घरेलू स्तर पर एआई को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी नेतृत्व स्थापित करना है। इसी कड़ी में क्वाड देशों—India, United States, Japan और Australia—के साथ तकनीकी सहयोग को भी मजबूती दी जा रही है।

कनेक्टिविटी: आकांक्षी भारत की मजबूत नींव

आकांक्षी भारत का एक सशक्त उदाहरण देश में कनेक्टिविटी का विस्तार है। विशाल भौगोलिक विविधता वाले भारत में तीव्र और समावेशी कनेक्टिविटी आवश्यक थी। इसी सोच के तहत नागरिक उड्डयन क्षेत्र में व्यापक सुधार किए गए और UDAN Scheme की शुरुआत की गई।

उड़ान योजना के माध्यम से:

टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए हवाई अड्डों का विकास हुआ।

हवाई यात्रा को किफायती बनाया गया।

लगभग 3 लाख उड़ानें संचालित हुईं।

डेढ़ करोड़ से अधिक यात्रियों ने इसका लाभ उठाया।

2014 में जहाँ देश में लगभग 70 हवाई अड्डे थे, वहीं अब इनकी संख्या 150 से अधिक हो चुकी है।

यह परिवर्तन दर्शाता है कि जब समाज की आकांक्षाएँ नीति-निर्माण का आधार बनती हैं, तो विकास को नई गति मिलती है।

शिक्षा, शोध और नवाचार में नई ऊँचाइयाँ

पिछले एक दशक में शिक्षा, कौशल विकास, अनुसंधान और रोजगार पर विशेष बल दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की उपस्थिति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पेटेंट और ट्रेडमार्क के क्षेत्र में देश ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। आज भारत वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, जहाँ हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने शोध केंद्र स्थापित किए हैं।

स्टार्टअप इकोसिस्टम और भविष्य की दिशा

भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी अभूतपूर्व विस्तार देख रहा है। नवाचार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और युवा प्रतिभा का संगम देश को तकनीकी महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर कर रहा है। एआई आधारित समाधान स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बना रहे हैं, शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बना रहे हैं तथा छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं।

समावेशी विकास की प्रतिबद्धता

नीतियाँ बनाते समय मध्यम वर्ग, सामान्य नागरिक, छोटे उद्यमी, एमएसएमई, युवा और महिलाओं की आकांक्षाओं को केंद्र में रखा जा रहा है। उद्देश्य स्पष्ट है—ईज ऑफ लिविंग और क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार।

भारत का यह डबल एआई विज़न—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आकांक्षी भारत—सिर्फ तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की व्यापक रूपरेखा है। यही संयुक्त शक्ति भारत को 21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रही है।

एआई की दुनिया: सुपर पावर बनाम मिडिल पावर

दुनिया अब एआई के मामले में दो हिस्सों में बंटती दिख रही है। एक तरफ वे देश हैं जो एआई सुपरपावर बन चुके हैं—जिनके पास अपार पूंजी, अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों की टीम है। दूसरी तरफ वे देश हैं जिन्हें “मिडिल पावर” कहा जा सकता है—जैसे भारत, कनाडा और यूरोप के कई देश—जो क्षमता तो रखते हैं, लेकिन संसाधनों की दौड़ में पीछे हैं।

एडवांस्ड एआई मॉडल तैयार करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश, शक्तिशाली डेटा सेंटर और उच्च स्तरीय रिसर्च इकोसिस्टम की जरूरत होती है। हर देश के लिए यह संभव नहीं। अगर मिडिल पावर देश इस रेस में पीछे रह गए, तो उनकी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हो जाएगी। उनका डेटा, उनका बाजार और उनकी डिजिटल संप्रभुता दूसरों के हाथों में चली जाएगी।

डिजिटल आज़ादी बनाम डिजिटल गुलामी

आज के दौर में देशों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है—डिजिटल रूप से स्वतंत्र और डिजिटल रूप से निर्भर। जिन देशों के पास अपना एआई सिस्टम, अपने सर्वर, अपना डेटा और अपनी तकनीक है, वे डिजिटल रूप से स्वतंत्र हैं। लेकिन जिनकी डिजिटल बुनियाद विदेशी कंपनियों पर टिकी है, वे धीरे-धीरे “डिजिटल गुलामी” की ओर बढ़ सकते हैं।

17वीं से 19वीं सदी के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपने नियंत्रण में ले लिया था। 21वीं सदी में वही काम डेटा, एल्गोरिद्म और एआई के माध्यम से किया जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हथियार तलवार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी होगी।

भारत की स्थिति और संभावनाएं

भारत आज अपना वैश्विक एआई प्लेटफॉर्म विकसित करने की दिशा में प्रयासरत है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी, मजबूत आईटी टैलेंट और विशाल डिजिटल बाजार है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

हाल ही में भारत ने “सर्वम” नाम का स्वदेशी एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जिसे एआई समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देखा। बताया जा रहा है कि यह 22 भारतीय भाषाओं में काम कर सकता है और कई मामलों में ChatGPT और Google Gemini को चुनौती देने की क्षमता रखता है। यह पहल दिखाती है कि भारत में क्षमता की कमी नहीं है—जरूरत है निरंतर निवेश और दीर्घकालिक रणनीति की।

इतिहास से सीख

इतिहास गवाह है कि जो देश बड़ी क्रांतियों में पीछे रह जाता है, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

1820 के आसपास शुरू हुई औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व इंग्लैंड ने किया।

1957 में अंतरिक्ष क्रांति की शुरुआत सोवियत संघ और अमेरिका ने की।

1969 में अमेरिका चांद पर पहुंच गया।

1970 के दशक में कंप्यूटर क्रांति का लाभ पश्चिमी देशों ने उठाया।

1990 के दशक की इंटरनेट क्रांति में भी भारत देर से शामिल हुआ।

2004 के बाद सोशल मीडिया क्रांति आई, लेकिन भारतीय उपयोगकर्ता विदेशी प्लेटफॉर्म्स के उपभोक्ता बनकर रह गए।

भारत ने जरूर तीन बड़ी ऐतिहासिक क्रांतियों का अनुभव किया—1947 की स्वतंत्रता, 1960 के दशक की हरित क्रांति और 1970 की श्वेत क्रांति—लेकिन टेक्नोलॉजी आधारित वैश्विक क्रांतियों में हम अक्सर देर से पहुंचे।

संकट के समय आत्मनिर्भरता का महत्व

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारत को दुश्मन की सटीक जीपीएस लोकेशन की आवश्यकता थी, लेकिन उस समय अमेरिका ने डेटा साझा करने से इनकार कर दिया। यह घटना बताती है कि संकट के समय उधार की तकनीक भरोसेमंद नहीं होती। एआई के युग में भी यही सिद्धांत लागू होता है।

आगे की राह

एआई केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि आने वाले समय की सबसे बड़ी शक्ति है। यह इंसानों के हाथों का ही नहीं, दिमाग का काम भी कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है—भविष्य में इंसान की भूमिका क्या होगी?

भारत के लिए अभी देर नहीं हुई है। अगर एआई को राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया जाए, रिसर्च और डेवलपमेंट पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जाए और स्वदेशी टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि वैश्विक नेतृत्व भी हासिल कर सकता है।

आज विकल्प साफ है—या तो हम एआई की मेज़ पर बैठकर नियम बनाएँ, या फिर दूसरों द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार चलें। आने वाले दशक तय करेंगे कि भारत डिजिटल आज़ादी की राह पर चलता है या डिजिटल निर्भरता की ओर।

Sundar Pichai (Google CEO)

Sundar Pichai ने अपने भाषण में कहा 
नमस्ते।
प्रधानमंत्री मोदी और यहां उपस्थित सभी विशिष्ट नेताओं का धन्यवाद। भारत वापस आकर हमेशा बहुत अच्छा लगता है। हर बार जब मैं यहां आता हूं, तो बदलाव की रफ्तार देखकर प्रभावित होता हूं—और आज भी कुछ अलग नहीं है।
जब मैं छात्र था, तब मैं अक्सर चेन्नई से आईआईटी खड़गपुर तक कोरमंडल एक्सप्रेस ट्रेन से सफर करता था। वहां पहुंचने के रास्ते में हम विशाखापट्टनम से गुजरते थे। मुझे याद है, वह एक शांत और साधारण तटीय शहर था, जिसमें अपार संभावनाएं थीं। आज उसी शहर में गूगल 15 अरब डॉलर के अपने भारत इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के तहत एक फुल-स्टैक एआई हब स्थापित कर रहा है। यह हब तैयार होने के बाद गीगावाट स्तर की कंप्यूटिंग क्षमता और एक नया अंतरराष्ट्रीय सब-सी केबल गेटवे प्रदान करेगा, जिससे भारत भर में लोगों और व्यवसायों को रोजगार और अत्याधुनिक एआई सुविधाएं मिलेंगी।
उस ट्रेन में बैठे हुए मैंने कभी नहीं सोचा था कि विशाखापट्टनम एक वैश्विक एआई हब बनेगा। जैसे मैंने यह भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं ऐसी टीमों के साथ काम करूंगा जो डेटा सेंटर को अंतरिक्ष में स्थापित करने की योजना बना रही होंगी, या अपने माता-पिता को सैन फ्रांसिस्को में पूरी तरह स्वायत्त (ऑटोनॉमस) कार की सवारी करवा रहा होऊंगा। जब मैंने अपने 83 वर्षीय पिता की आंखों से एक वेमो कार को चलते देखा, तो प्रगति का अर्थ मेरे लिए बिल्कुल नया हो गया। हालांकि उन्होंने कहा कि वे तब ज्यादा प्रभावित होंगे जब यह भारत की व्यस्त सड़कों पर भी काम करने लगेगी। उस पर अभी काम चल रहा है, पिताजी।
यह प्रगति दिखाती है कि जब मानवता बड़े सपने देखती है तो क्या संभव हो सकता है। और कोई भी तकनीक मुझे एआई जितना प्रेरित नहीं करती। हम अभूतपूर्व प्रगति और नई खोजों के दौर की दहलीज पर खड़े हैं, जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पुराने ढांचे की कमियों को पार करने में मदद कर सकती हैं। लेकिन यह परिणाम अपने आप सुनिश्चित नहीं है। ऐसा एआई बनाने के लिए जो वास्तव में सबके लिए उपयोगी हो, हमें साहसिक कदम उठाने होंगे, जिम्मेदारी से आगे बढ़ना होगा और इस निर्णायक क्षण में मिलकर काम करना होगा।
साहसिक क्यों? क्योंकि एआई अरबों लोगों के जीवन को बेहतर बना सकता है और विज्ञान की सबसे कठिन समस्याओं को हल कर सकता है। 50 वर्षों तक प्रोटीन संरचनाओं की भविष्यवाणी एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती रही, जिससे दवा खोज की प्रक्रिया धीमी रही। डेमिस हसाबिस और उनकी टीम ने यह साहसी प्रश्न पूछा—क्या हम एआई की मदद से इसे हल कर सकते हैं? इस प्रयास ने न केवल नोबेल पुरस्कार जीता, बल्कि दशकों के शोध को एक ऐसे खुले डेटाबेस में संकलित कर दिया, जिसका उपयोग आज 190 से अधिक देशों के 30 लाख से ज्यादा शोधकर्ता कर रहे हैं। इससे मलेरिया के टीके विकसित हो रहे हैं, एंटीबायोटिक प्रतिरोध से लड़ाई हो रही है और बहुत कुछ संभव हो रहा है।
हम वैज्ञानिक क्षेत्र के हर स्तर पर ऐसे ही साहसी प्रश्न पूछ रहे हैं—डीएनए रोग चिन्हों की सूची बनाने से लेकर ऐसे एआई एजेंट विकसित करने तक, जो वैज्ञानिक पद्धति में सच्चे साझेदार की तरह काम कर सकें।
हमें उन क्षेत्रों की समस्याओं को हल करने में भी उतना ही साहसी होना चाहिए, जहां तकनीक की पहुंच सीमित रही है। उदाहरण के लिए, एल सल्वाडोर में गूगल सरकार के साथ मिलकर सस्ती एआई-संचालित चिकित्सा जांच और उपचार उपलब्ध करा रहा है। भारत में हम मिलकर किसानों की आजीविका को मानसून के प्रभाव से बचाने में मदद कर रहे हैं। पिछले साल पहली बार भारतीय सरकार ने लाखों किसानों को एआई-संचालित मौसम पूर्वानुमान भेजे, जो हमारे न्यूरल जीसीएम मॉडल की मदद से संभव हुआ।
भाषाई समावेशन भी एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। घाना में हम विश्वविद्यालयों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर 20 से अधिक अफ्रीकी भाषाओं में अनुसंधान और ओपन-सोर्स टूल्स का विस्तार कर रहे हैं।
हमें स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक अवसरों जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए इस तरह की साहसी सोच की जरूरत है। तकनीक अद्भुत लाभ देती है, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर किसी को इनका लाभ मिले। डिजिटल खाई को एआई खाई में बदलने नहीं देना चाहिए।
इसका अर्थ है कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी में निवेश करना। मैंने विशाखापट्टनम में हमारे निवेश का जिक्र किया। ऐसे ही निवेश थाईलैंड, मलेशिया और अन्य देशों में भी हो रहे हैं। हम अमेरिका-भारत कनेक्ट पहल के तहत अमेरिका और भारत के बीच चार नए सब-सी फाइबर ऑप्टिक सिस्टम भी बना रहे हैं।
जिम्मेदारी का अर्थ है आर्थिक बदलावों को समझदारी से संभालना। एआई कार्यबल को बदलेगा—कुछ भूमिकाएं स्वचालित होंगी, कुछ विकसित होंगी और नई नौकरियां पैदा होंगी। 20 साल पहले एक पेशेवर यूट्यूब क्रिएटर की कल्पना भी नहीं थी। आज दुनिया भर में लाखों लोग यह काम कर रहे हैं। हमने 10 करोड़ लोगों को डिजिटल कौशल में प्रशिक्षित किया है, और हमारा नया गूगल एआई प्रोफेशनल सर्टिफिकेट लोगों को अपने काम में एआई का उपयोग करना सिखाएगा।
अंत में, विश्वास ही अपनाने की बुनियाद है। हमने सिंथआईडी जैसे टूल बनाए हैं, जिनका उपयोग पत्रकार और फैक्ट-चेकर्स सामग्री की प्रामाणिकता जांचने के लिए कर रहे हैं।
लेकिन चाहे हम कितने भी साहसी और जिम्मेदार क्यों न हों, एआई का पूरा लाभ तभी मिलेगा जब हम मिलकर काम करेंगे। सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है—नियम बनाने में, जोखिमों को संबोधित करने में और सार्वजनिक सेवाओं में एआई को अपनाने में। दुनिया भर में इसके उदाहरण दिख रहे हैं—युगांडा में एआई और सैटेलाइट इमेजरी से विद्युतीकरण के प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की जा रही है, और अमेरिका के मेम्फिस शहर में बसों से सड़क की सतह का स्कैन कर गड्ढों की मरम्मत तेजी से की जा रही है।
टेक कंपनियों को भी आगे आना होगा—ऐसे उत्पाद बनाने होंगे जो ज्ञान, रचनात्मकता और उत्पादकता बढ़ाएं। हर आकार की कंपनियों को एआई अपनाकर अपने व्यवसायों और क्षेत्रों में नवाचार करना होगा।
हमारे पास एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाला अवसर है—लाखों-करोड़ों लोगों का जीवन बेहतर बनाने का। मुझे विश्वास है कि हमारे पास यह क्षमता भी है और यहां उपस्थित नेताओं को देखकर मुझे भरोसा है कि हमारे पास यह इच्छा शक्ति भी है। अब हमें मिलकर काम करना है।

Narendra Modi

Narendra Modi ने अपने भाषण में कहा कि यह समिट एक ह्यूमन सेंट्रिक सेंसिटिव ग्लोबल एआई इकोसिस्टम के निर्माण में अहम भूमिका निभाएगा। फ्रेंड्स हम इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि इंसान ने हर डिरप्शन को एक नए अवसर में बदला है। आज हमारे सामने फिर ऐसा ही अवसर आया है। हमें मिलकर इस डिसरप्शन को मानवता के सबसे बड़े अवसर के रूप में बदल देना है। फ्रेंड्स भारत बुद्ध की धरती है। और भगवान बुद्ध ने कहा था राइट एक्शन कम्स फ्रॉम राइट अंडरस्टैंडिंग। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि हम साथ मिलकर ऐसा रोड मैप बनाएं जिससे एआई का सही इंपैक्ट दिखे और सही इंपैक्ट तभी आता है जब हम सही समय

पर सही नियत से सही निर्णय लेते हैं। फ्रेंड्स, कोविड ग्लोबल पेंडेमिक के समय दुनिया ने देखा है कि जब हम एक दूसरे के साथ खड़े होते हैं तो असंभव भी संभव हो जाता है। वैक्सीन विकास से लेकर सप्लाई चेन तक डाटा साझा करने से लेकर जीवन बचाने तक सहयोग ने ही समाधान दिया। टेक्नोलॉजी कैसे मानवता की सेवा का माध्यम बन सकता है यह हमने भारत में कोविड काल में देखा है। हमारा जो डिजिटल वैक्सीनेशन प्लेटफार्म था उसने करोड़ों लोगों को समय पर वैक्सीननेट कराने में बहुत मदद की। हमारे यूपीआई ने उन मुश्किल परिस्थितियों में भी यह सुनिश्चित किया कि लोग आसानी से
ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करते रहे। यूपीआई ने भारत में डिजिटल डिवाइड को दूर करने में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। बीते वर्षों में भारत ने एक वाइब्रेंट डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है। हम इसे दुनिया के साथ भी शेयर कर रहे हैं। क्योंकि हमारे लिए टेक्नोलॉजी पावर का नहीं बल्कि सेवा का माध्यम है। पावर नहीं एंपावर करना। एआई की दिशा भी ऐसी होनी चाहिए जिससे पूरी मानवता का कल्याण हो। फ्रेंड्स अतीत में टेक्नोलॉजी ने डिवीजन क्रिएट किए। लेकिन वर्तमान में एआई टेक्नोलॉजी सबके लिए सुलभ हो। सबकी पहुंच में हो। यह
हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए आज जब हम एआई के फ्यूचर पर चर्चा कर रहे हैं तो हमें ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं को भी एआई गवर्नेंस के केंद्र में रखना होगा। एक्सीलेंसीज युग चाहे कोई भी रहा हो एथिक्स हमेशा ही चर्चा के केंद्र में रहा है। अंतर बस इतना आया है। कि पहले अनएथिकल बिहेवियर का दायरा बहुत छोटा होता था। लेकिन एआई में इसका दायरा असीमित है। अनलिमिटेड है। इसलिए एआई के लिए हमें एथिकल बिहेवियर और नॉर्म्स का दायरा भी असीमित बनाना होगा। एआई कंपनियों के सामने बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। प्रॉफिट के साथ-साथ पपज पर भी फोकस हो।
ऐसे एथिकल कमिटमेंट की बहुत आवश्यकता है। व्यक्तिगत स्तर पर एआई हमारी लर्निंग, इंटेलिजेंस और इमोशंस को प्रभावित कर रही है। एक्सीलेंसी एआई के एथिकल उपयोग के लिए मेरे तीन सुझाव हैं। फर्स्ट डाटा सोवनिटी को रिस्पेक्ट करते हुए एआई ट्रेनिंग के लिए एक डाटा फ्रेमवर्क बने। जैसे एआई में कहा जाता है गार्बेज इन गार्बेज आउट। अगर डाटा सुरक्षित संतुलित विश्वसनीय नहीं होगा तो आउटपुट भी भरोसेमंद नहीं होगा। इसलिए ग्लोबल ट्रस्टेड डाटा फ्रेमवर्क जरूरी है। सेकंड एआई प्लेटफार्म अपने सेफ्टी रूल्स बहुत क्लियर और ट्रांसपेरेंट
रखें। हमें ब्लैक बॉक्स के बदले ग्लास बॉक्स अप्रोच चाहिए। जहां सेफ्टी रूल्स देखें। और वेरीफाई किए जा सके तब अकाउंटेबिलिटी भी क्लियर होगी और बिजनेस में एथिकल बिहेवियर को भी बूस्ट मिलेगा। थर्ड एआई रिसर्च में पेपर क्लिप प्रॉब्लम का उदाहरण दिया जाता है। अगर किसी मशीन को सिर्फ पेपर क्लिप बनाने का लक्ष्य दे दिया जाए तो वह उसका एक काम के लिए दुनिया के सारे रिसोर्सेज को दांव पर लगाकर भी वही काम करती रहेगी। इसलिए एआई को क्लियर ह्यूमन वैल्यूस और गाइडेंस की जरूरत है। टेक्नोलॉजी पावरफुल है लेकिन डायरेक्शन हमेशा मानव ही तय करेगा।
फ्रेंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एआई की ग्लोबल जर्नी में एस्पिरेशनल इंडिया एआई की बड़ी भूमिका है। और अपने इस दायित्व को समझते हुए भारत आज बड़े कदम उठा रहा है। अपने एआई मिशन के माध्यम से आज भारत में 38,000 जीपीएल मौजूद हैं। और अगले 6 महीनों में हम 24000 जीपीयूस और लगाने जा रहे हैं। हम अपने स्टार्टअप्स को बहुत ही अफोर्डेबल रेट्स पर वर्ल्ड क्लास कंप्यूटिंग पावर उपलब्ध करा रहे हैं। हमने एक एआई कोस्ट भी बनाया है। इसके माध्यम से 7500 से अधिक डाटा सेट्स और 270 एआई मॉडल्स को नेशनल रिसोर्स के रूप में शेयर किया गया है। फ्रेंड्स एआई को लेकर
भारत की दिशा स्पष्ट है। भारत का विचार स्पष्ट है। एआई पूरी मानवता की भलाई के लिए एक शेड रिसोर्स है। हमें मिलकर ऐसा एआई फ्यूचर बनाना होगा जो इनोवेशन को आगे बढ़ाएं। इंक्लूजन को मजबूत करें और ह्यूमन वैल्यूज का समावेश करके आगे बढ़े। जब टेक्नोलॉजी और ह्यूमन ट्रस्ट साथ-साथ चलेंगे तो एआई का सही इंपैक्ट दुनिया पर दिखेगा। तो यहां पर प्रधानमंत्री का लीडर्स प्लनरी में संबोधन और एथिकल एआई के लिए तीन सुझाव उन्होंने बताए यहां पे कि कैसे डाटा सोवनिटी ग्लोबल ट्रस्टेड डाटा फ्रेमवर्क को लेकर काम करना जरूरी है। साथ ही एआई की
जो सेफ्टी रूल्स हैं वो पारदर्शी हो यानी कि ब्लैक बॉक्स की जगह ग्लास बॉक्स अप्रोच हो और एआई क्लियर ह्यूमन वैल्यूस और गाइडेंस की जरूरत है। ऐसे में एआई एक बहुत ही ताकतवर टेक्नोलॉजी है। इसलिए हमेशा जो गाइडेंस रहे वह मानवता ही करेंगे और साथ ही आई को लेकर जो भारत का विचार


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